रुचि के स्थान

पानीपत युद्ध संग्रहालय, हेमू समाधि-स्थान, बाबर व  अकबर की छावनी, सोंदापुर  गांव में इब्राहिम लोढ़ी की कब्र , काबुली बाग, देवी मंदिर, काला आम, सालर गज गेट और तेरहवीं सदी सूफी संत बुउ अली शाह कलंदर की कब्र आकर्षण के मुख्य स्थान हैं।

पानीपत संग्रहालय

हरियाणा सरकार द्वारा गठित बैटल आफ पानीपत मेमोरियल सोसायटी ने पानीपत की तीन लड़ाइयों और देश के समग्र इतिहास पर उनके प्रभाव के लिए महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटनाओं को उजागर करने के लिए एक संग्रहालय बनाया गया है। पानीपत संग्रहालय की स्थापना का उद्येश्य तीन लड़ाइयों, कला, इतिहास, शिल्प और पुरातत्व के बारे में जानकारी प्रदान करना है। संग्रहालय में मूर्तियाँ, एंटीक वस्तुएं, हथियार, मिट्टी के बर्तन, गहनें, महत्वपूर्ण दस्तावेज़, पांडुलिपियाँ, कला और शिल्प की वस्तुएं, हस्तशिल्प, नक्शे, लेख, फोटो, स्लाइड सहित और भी बहुत कुछ प्रदर्शित किया गया है जो देश के उन बेटों की देशभक्ति और वीरता पर प्रकाश डालती हैं जिन्होंने आक्रमणकारियों को बाहर निकालने के लिए अपने जीवन का बलिदान दिया था। इस संघर्ष में अनेक सम्मानित नाम जैसे- हरियाणा में रेवाड़ी से एक स्थानीय नायक,सम्राट हेमचंद विक्रमादित्य, राजस्थान में भरतपुर के राजा सूरजमल, पटियाला के महाराज और सदाशिव राव भाऊ, तुकुज शिंदे, विश्वास राव पेशवा जैसे मराठा नायकों सहित अनगिनत अन्य वीर शामिल हैं।

हुमायु समाधि स्थल

उसने पानीपत की दूसरी लड़ाई में मुग़ल सेनाओं के खि़लाफ लड़ाई लड़ी थी। जब वह लड़ाई जीतने वाला था, बिल्कुल तभी उसकी आँख में एक तीर आकर लग गया था। हेमू बेहोश हो गया और कैद कर लिया गया। पानीपत में जींद रोड पर स्थित सौंधपुर में अकबर के सामने लाते समय वह मर गया था।  हेमू के मित्रों और समर्थकों ने उसके सिर कटने के स्थान पर उसकी समाधि का निर्माण किया।

इब्राहिम लोदी की मकबरा

सन् 1526 में इब्राहिम लोधी ने बाबर के साथ लड़ाई लड़ी, जिसमें उसकी हार हुई और वह मारा गया। लड़ाई स्थल पर ही इब्राहिम लोधी को दफनाया गया। बाद में अंग्रेजों ने इस स्थान पर एक बहुत बड़ा चबूतरा बनवाया तथा एक पत्थर पर उर्दू में इस कब्र के महत्व के बारे में लिखवाया। यह स्थान (इब्राहिम लोधी की कब्र) पानीपत के तहसील कार्यालय के निकट है। इब्राहिम लोधी की कब्र के साथ एक बहुत ही शानदार पार्क विकसित किया गया है जिसमें पर्यटकों के लिए अनेक प्रकार के फूल व फव्वारे लगे हुए हैं।

काबुली बाग

काबुली बाग में गार्डन, एक मस्जिद और एक टैंक बना हुआ है जिसे मुगल सम्राट बाबर ने पानीपत की पहली लड़ाई में इब्राहिम लोधी पर अपनी जीत का जश्न मनाने के लिए बनवाया था। उसने इस मस्जिद और गार्डन का नाम अपनी पत्नी मुस्समत काबुली बेग़म के नाम पर रखा था। 1557 ई. के अनुसार इस शिलालेख पर 934 हिजरी की तारीख है। इस मस्जिद के दोनों ओर दो कक्ष बने हुए हैं। इसके चारों ओर लगी हुई रेलिंग पर फारसी शिलालेख बने हुए है।

देवी मंदिर

सालारजंग गेट के समीप स्थित देवी मंदिर इस समय पानीपत मेें उपलब्ध प्राचीनतम हिन्दू स्मारक है। कहा जाता है कि पानीपत के तीसरे युद्घ के समय भी इस स्थान पर एक विष्णु मंदिर और यहां वर्तमान तालाब विद्यमान था। इसी तालाब के आसपास मराठा सेना ने अपना युद्घ शिविर लगाया था और युद्घ के पश्चात जो मराठा यहीं बस गये थे उन्होंने इस देवी मंदिर का निर्माण करवाया। देवी मंदिर प्रांगण में जाने के लिए सडक़ के साथ ही एक बड़ा प्रवेश-द्वार बना है। यह प्रवेश-द्वार 1904 ई0 (वि.सं.1961)में बनवाया गया था। इस प्रवेश द्वार के अंदर जाने पर बांयी और यात्रियों की सुविधा के लिए बने कमरों को 1913 ई0 में बनवाने का उल्लेख इस पर लगाये गये, उर्दू में लिखे गये एक शिलालेख में है-इसके साथ ही एक तीदरा (तीन दरवाजों वाला कक्ष)भी है जिसमें आजकल देवी मंदिर का प्रबंध देखने वाली कमेटी अग्रवाल वैश्य पंचायत रजि. का कार्यालय है। इसके अतिरिक्त इस प्रांगण में अनेक नवनिर्मित भवनों में बाबा सरन दास जी महाराज की समाधि, गूगा मंदिर, सत्संग हाल आदि है तथा प्राचीन भवनों में चार दिवारी युक्त देवी मंदिर, गंगा मंदिर और एक वृहद तालाब है। तालाब अब पूर्णत: सूख चुका है।

गंगा मंदिर 1868 ई0 में बना है जिसका उल्लेख इस मंदिर पर लगाये गये सफेद संगमरमर पत्थर पर उत्कीर्णित स्थानीय हिन्दी और उर्दू भाषा के शिलालेख में है। उर्दू लेख का भावार्थ इस प्रकार है:-गंगा मंदिर के अंदरूनी छत में तत्कालीन चित्रकारी के कुछ अवशेष आज भी देखे जा सकते है। मंदिर के लेख से ऐसा लगता हे कि यह वास्तव में राम मंदिर बनाया गया होगा, जिसे बाद में गंगा मंदिर के रूप में परिवर्तित किया गया है। इस परिसर में स्थित ऐतिहासिक तालाब के उत्तर-पूर्वी कि नारेे पर देवी मंदिर है, जिसके चारों ओर एक चार दिवारी भी बनी है। मंदिर की चादिवारी में तालाब की ओर के दक्षिण-पश्चिमी कोने पर एक आकर्षक अष्टभुजी छतरी है। इस छतरी के सभी ओर के निकासों को इंटो से जालीदार चिनाई करके बन्द कर दिया गया है। आजकल मंदिर का नवनिर्मित मुख्य प्रवेश-द्वार पूर्व की ओर है। इसके अतिरिक्त दक्षिणी भाग की चारदिवारी में भी एक अन्य दोमंजिला भव्य प्रवेश-द्वार भी बना है। मंदिर की दक्षिणी चार दिवारी में बने दो मंजिले भवन में नीचे प्रवेश-द्वार और ऊपर एक बारादरी है, जो वास्तव में नगार खाना है। इस नगार खाने से मंदिर का नगाड़ा बजाया जाता है। इस प्रवेश द्वार की अन्दरूनी दीवार पर सफेद संगमरमर पत्थर पर काले रंग से उर्दू में लिखा एक लेख है जिसमें इस नगार खाने को लगभग एक शताब्दी पूर्व बनवाने का उल्लेख है। लेख इस प्रकार है:-देवी मंदिर की चार-दिवारी के अन्दर बांयी ओर सबसे पहले महाकाली मंदिर है। इसके दरवाजे के ऊपर एक पत्थर पर काले रंग से उर्दू और स्थानीय हिन्दी भाषाओं लिखा गया एक शिला लेख है जिसमें इस काली मंदिर को बनवाने का उल्लेख है।

इस काली मंदिर के साथ दुर्गा मंदिर है जिसमें सफेद संगमरमर पत्थर से निर्मित सिंहवाहिनी दुर्गा के रूप में देवी की प्रतिमा स्थापित है। यही देवी मंदिर प्रांगण का मूल एवं प्राचीन मंदिर है। इस मंदिर के सामने का स्तंभयुक्त बरामदा बाद में बनवाया गया है। इस आशय का सफेद पत्थर पर काले रंग से हिन्दी में लिखा गया एक लेख इस बरामदे में लगा है जो इस प्रकार है- इस मंदिर के सामने खुले प्रांगण में छोटे-छोटे दो मंदिर हैं जिन्हें शिव मंदिर और सत्यनारायण मंदिर कहा जाता है। स्थापत्य की दृष्टि से ये दोनों ही मंदिर छोटे, कम ऊंचाई के और वर्गाकार कक्ष के रूप में बने हैं। इन दोनों मंदिरो के ऊपर गोल गुम्बदाकृति के आकर्षक शिखर है। इन मंदिरों के प्राचीन एवं मूल ढ़ांचे पर अब नवीन पलस्तर और संगमरमर आदि लगा दिया गया है। इनमें से शिव मंदिर पर लगाये गये लेख पर चूना इत्यादि लगाये जाने तथा कुछ अक्षर खराब हो जाने के कारण पूरी तरह पढ़ा नहीं जा सका। किन्तु जितना पढ़ा जा सका है उसके आधार पर यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि- आकर्षण के पुत्र रामचन्द्र ने संवत 1671 (1614 ई0) में कोई मंदिर बनवाया है।

इस देवी मंदिर प्रांगण में उपलब्ध सभी लेखों में यह प्राचीनतम लेख है। संभवत: यह लेख उस मंदिर का होगा, जिसके बारे में आज भी प्रचलित है कि पानीपत के तीसरे युद्घ के समय जब मराठा सेना ने इस तालाब के आसपास अपना शिविर डाला था, उस समय इस तालाब के पास एक प्राचीन मंदिर था। किन्तु वर्तमान शिव मंदिर स्थापत्य के आधार पर 18वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में बना प्रतीत होता है। अत: इस बात की पूर्ण संभावना है कि इस मंदिर का भी पुननिर्माण भी साथ में बने सत्यनारायण मंदिर के साथ ही करवाया गया होगा और पुननिर्माण का पश्चात वह लेख पुन: इस मंदिर पर लगा दिया गया होगा।

देवी मंदिर प्रांगण में सबसे प्राचीन मूर्तियां इसी सत्यनारायण मंदिर में है। 9-10वीं शताब्दी की दो प्रतिमाएं लक्ष्मी नारायण (गरूड पर बैठे विष्णु और लक्ष्मी) और हरिहर (विष्णु और शिव का संयुक्त रूप) की हैं। इसलिए ऐसा प्रतीत होता है कि किंवदन्तियों में बताये जा रहे तालाब के निकट का प्राचीन मंदिर इसी स्थान पर होगा। जिसे 1795 ई0 में राम दिपाल ने बनवा कर इन प्राचीन मूर्तियों को इसमें पुन: स्थापित करवाया होगा। देवी मंदिर की पंक्ति में कृष्ण मंदिर, संतोषी माता मंदिर, राम मंदिर, काली मंदिर, बृहस्पति मंदिर आदि कई छोटे-छोटे नवनिर्मित मंदिर भी है। बृहस्पति मंदिर यद्यपि प्राचीन है किन्तु इसके शिखर छोडक़र शेष सभी स्थानों पर अब सफेद संगमरमर पत्थर लगाकर मंदिर का पूरी तरह नवीनीकरण किया जा चुका है। इसके पीछे लगभग एक शताब्दी पूर्व की सिद्घ योगी शिव गिरि समाधि है और इसका भी नवीनीकरण किया जा चुका है। इस पर लगाये गये लेख में संवत्ï 1955 (1898 ई0) में सिद्घ योगी शिव गिरि के मृत्यु की तिथि अंकित है। लेख इस प्रकार है- इस प्रकार देवी मंदिर में उपलब्ध कुल 10 शिलालेखों से इस मंदिर परिसर में समय-समय पर हुए निर्माण कार्याे की जानकारी मिलती है। इनमें प्राचीनतम शिलालेख 1614 ई0 का है और दो मूर्तियां लगभग एक हजार वर्ष पुरानी हैं, जो पानीपत के तृतीय युद्घ से पूर्व इस स्थान पर एक मंदिर होने की (1898 ई0) पुष्टिï करने के लिए पर्याप्त प्रमाण हैं। इसके बाद इस मंदिर प्रांगण में क्रमश: सत्यनारायण मंदिर (1795 ई0) तलाब के पूर्वी किनारे पर बना गंगा मंदिर (1868 ई0), काली मंदिर (1877 ई0), नगार खाना (1878 ई0), समाधि (1898 ई0), मंदिर का मुख्य प्रवेश द्वार (1904 ई0) तिदरा (1912ई0)और उसके साथ धर्मशाला कक्ष (1913 ई0) तथा अन्त में देवी मंदिर के सामने का बरामदा (1924 ई0) निर्मित होते गये। ये लेख इस तथ्य की पुष्टिï करते है कि समय-समय पर करवायी गयी मरम्मत और नवीनीकरण के कारण यद्यपि इस मंदिर परिसर में इस समय उपलब्ध प्राचीनतम भवन भी लगभग दो शताब्दियों से अधिक प्राचीन दिखाई नहीं दे रहा है, बावजूद इसके, यह मंदिर कम से कम लगभग चार शताब्दियों से अनवरत जीवन्त है।

काला आम

काला आम्ब स्मारक 70 हजार मराठों के बलिदान की कहानी है जिन्होंने पानीपत की तीसरी लड़ाई में वीर गति प्राप्त की थी। इस लड़ाई में मराठों व मुगल सल्तनत के सरताज अहमदाशाह अब्दाली में लगातार पांच मास घमासान युद्घ हुआ था। जिस स्थल पर मराठा सरदार सदाशिवराम भाऊ का शरीर गिरा था वह काला अम्ब के नाम से चबूतरा है। काला आम्ब के पीछे एक बड़ा विचित्र ऐतिहासिक तथ्य जुड़ा हुआ है जिन दिनों पानीपत में तीसरी लड़ाई लड़ी जा रही थी उन्हीं दिनों काला आम्ब स्थान पर एक बहुत बड़ा आम का वृक्ष हुआ करता था और सैनिक लड़ाई के उपरान्त उसके नीचे विश्राम करते थे। 70 हजार मराठों के रक्त से रंजित इस स्थान पर स्थित इस आम के वृक्ष का रंग भी काला पड़ गया था और प्रत्येक वर्ष जब इस पर आम लगते थे तो उन्हें चीरने पर उनमें से खून निकलना शुरू हो जाता था। बाद में जब यह वृक्ष सूख गया तो उस समय के प्रसिद्घ कवि पंडित सुगन चन्द रईस ने इसे खरीद लिया और इसकी लकड़ी से एक बढई ने अत्यन्त सुन्दर दरवाजे का निर्माण किया था। यह दरवाजा पहले गांधी मैमोरियल हाल में लगा हुआ था। जिसे पानीपत म्यूजियम में रखा गया है।
इस युद्घ स्मारक को विकसित करने हेतु तत्कालीन राज्यपाल स्व0 श्री जी.डी. तपासे की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया गया था और इसके निर्माण हेतु आॢकलोजी एवं म्यूजियम विभाग हरियाणा द्वारा 63 लाख रूपये की ग्रांट से युद्घ स्मारक कम्प्लैक्स का निर्माण किया गया। जिसमें दूर दराज से आने वाले पर्यटकों के आकर्षण के लिए एक शानदार पार्क, मिन्नी झील व पर्यटन विभाग का एक कैफे हाऊस व पर्यटकों के ठहरने के लिए चार कमरों का निर्माण किया गया। हरियाणा के भूतपूर्व राज्यपाल श्री जी.डी. तापसे ने इस स्थल को शहीदी स्मारक का नाम दिया था 9 अगस्त 1992 को हरियाणा के तत्कालीन राज्यपाल श्री धनिक लाल मण्डल ने इसे हरियाणा राज्य ने नाम समॢपत कर दिया।

सलार गंज गेट

पानीपत नगर के मध्य स्थित यह त्रिपोलिया दरवाजा प्राचीन आबादी का प्रवेश द्वार है जिसका निर्माण ब्रिटिश काल में हुआ था। जो नवाब सलारजंग के नाम से जाना जाता है। यह दरवाजा प्राचीन वास्तुकला का उत्कृष्ट नमूना है। यह पानीपत शहर के बीच मुख्य आर्टीरियल सड़क पर स्थित है।

बू-अली शाह कलंदर का मकबरा

यह इमारत 700 वर्ष पुरानी दरगाह के रूप में जानी जाती है जिसे खिजर खान ओर शाह खान अलाऊदीन खिलजी के पुत्रों ने बनवाया था। बू-अलीशाह कलन्दर जोकि सलार फकीरूदीन के सुपुत्र थे, वर्ष 1190 ई0 में पैदा हुए थे।
बू-अलीशाह कलन्दर के पिता का नाम शेखफखरूदीन ईराकी था। इनकी मां का नाम हाफिजा बीबी जमाला था। कहा जाता है कि इनके बड़े भाई शेख निजामुदीन ईराकी व्यापार के लिए भारत आए और पानीपत बस गए। बाद में मां की ममता अपने आप को नहीं रोक पाई जिसके परिणामस्वरूप बू-अलीशाह कलन्दर के माता पिता दोनों ही सन 1205 में यहा आ बसे और चार वर्ष पश्चात 1209 में बू-अलीशाह कलन्दर रखा गया। इनकी मातृ भाषा फारसी थी। यह विद्वान व सर्वगुण सम्पन्न थे।  इन्होंने गुरू मौलाना सिराजूदीन मकी से करीब चालीस साल शिक्षा ली और पानीपत में ही रहे। इसके बाद ये दिल्ली में कुतुबमीनार क्षेत्र में रहकर सूफी संतों की सेवा करते रहे और सभी विद्याओं में निपुण हो गए। परन्तु किसी कारणवश ये अपनी सभी किताबों को दरिया में फैंक कर इबादत करने के लिए जंगल में चले गए, जहां उनको आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त हुआ जिससे इन्होंने अपने जीवन में बहुत चमत्कार किए और उनके बहुत शिष्य बन गए। एक समय की बात है कि एक बार सुलतान ग्यासुदीन का लडक़ा शहजादा मुबारिक खां इनका चेला बन गया और इनको उसने इतना प्यार हो गया है कि वे एक पल के लिए सभी उनसे अलग नहीं रह सकते थे। मुबारिक खां की उच्च योग्यताओं ने बु-अलीशाह कलन्दर को अपनी तरफ आकर्षित कर लिया कि अचानक सुलतान अलाऊदीन शिकार खेलते-खेलते पानीपत तक आ पहुंचे और हजरत बु-अलीशाह कलन्दर से मिले। हजरत साहब ने सुलतान अलाऊदीन को कहा कि हमारे लिए एक मकबरा बनवाएं और उसका निर्माण किसी कुरान के पढ़े लिखे हाफिज से करवाएं। सुलतान अलाऊदीन ने हजरत की बात पर गौर फरमाया और हां कह दी। सुलतान अलाऊदीन ने हजरत के लिए उस समय अच्छे-अच्छे खाने बनवाए। हजरत ने खाना खा कर बचा हुआ खाना अपने चहते चेले मुबारिक खां को कूड़े में फैंकने के लिए कहा कि लेकिन मुबारिक खां उसे प्रसाद समझ कर खुद खा गया। खाना खाते ही उसका देहान्त हो गया। मुबारिक खां के मरने की खबर जब हजरत को मिली तो लाश को मंगवाकर रोते हुए कहा कि ये दोस्त तुझे बज्में यार जाना मुबारिक हो जो मकबरा अलाऊदीन को कहकर बनवाया था उसमें मुबारिक खां को दफना दिया गया। आज भी वह मकबरा बु-अलीशाह कलन्दर दरगाह में सबसे आगे हैं। जो दर्शकगण मजार के दर्शन के लिए आते हैं सबसे पहले वह मुबारिक खां की मजार पर हाजरी देते हैं।
आज इस दरगाह को इतना सुन्दर व रमणीक बना दिया गया है कि दूर-दराज से लोग इसकों देखने के लिए आते हैं और मन्नतें मांगते हैं। प्रत्येक गुरूवार को यहां पर सभी जाति व धर्म के श्रद्घालु आकर श्रद्घासुमन अॢपत करते हैं। दरगाह के परिसर में एक अति सुन्दर तालाब व एक लाईब्रेरी भी बनाई गई है। जिसमें भारत के सूफी संतों व अन्य गणमान्य व्यक्तियों की जीवनियों पर आधारित पुस्तकें उपलब्ध हैं। दरगाह के प्रवेश द्वार के बार तरफ प्रसिद्घ उर्दू कवि हजरत अलताफ हुसैन हाली का मकबरा है। इस दरगाह में चौबीस घंटे व 12 महीने लंगर चलता है व श्रद्घालुओं को ठहरने के लिए नि:शुल्क आवास सुविधा भी दी जाती है। दरगाह की पिछली तरफ हजरत बु-अलीशाह कलन्दर के मां-बाप की दरगाह है जिसे माहजी कहते है। बु-अलीशाह कलन्दर की दरगाह पानीपत के मध्य में स्थित है जो हिन्दु मुस्लिम सिख सभी के लिए पूज्य स्थल व संगमरमर के पत्थरों से बनाया हुआ इसका फर्श सुन्दरता की एक मिशाल है। इसके आगे कसोटी के चार खम्बे हैं जिन पर सोने की परख की जाती है। इस मजार के साथ ही उर्दु कवि हकीम मुकरब खान तथा ख्वाजा अलताफ हुसैन हाली के मकबरे बने हुए हैं, पाकिस्तानी लोग उसे मुबारक के अवसर पर खिराजे अकीदल पेश करते आते हैं। प्रत्येक बृहस्पतिवार को मुस्लिम, हिन्दु व सिख सभी सम्प्रदायों के लोग इस इदगाह में प्रार्थना करते, प्रसाद चढाते तथा मन्नत मानते हैं।

अरन्तुक यक्ष मन्दिर

यह मन्दिर अस्थल त्रिखू तीर्थ के नाम से जाना जाता है। यह तीर्थ सींख व पाथरी गांव की सीमा पर स्थित है। यह स्थान महाभारत काल के समय का है और कहा जाता है कि यह महाभारत का चौथा दक्षिण पूर्वी द्वार था जिसके द्वारपाल मंच कुर्क यक्ष था। यहां पर वह तालाब भी है जहां पर यक्ष द्वारा युधिष्टर से संवाद किए गए थे। इस दौरान युधिष्टर से जीवन से सम्बन्धित पांच प्रश्न पूछे गए थे जो इस प्रकार हैं।

  1. सबसे बड़ा आश्चर्यमौत को याद न रखना जबकि यह जरूरी है।
  2. सबसे पवित्र जलइन्द्र जल
  3. सबसे तेज चलने वाली वस्तुमन
  4. सबसे बड़ा धर्म कौनसा हैदान
  5. आप अपने पहले कौन से एक भ्राता को जिन्दा करवाना चाहते है — नकुल व सहदेव में से एक क्योंकि माद्री के एक पुत्र को जीवित करवाना आवश्यक है, कुन्ती का एक पुत्र मैं जीवित हूॅ।

पुरातत्व विभाग द्वारा यहां पर जो अवशेष पाए गए है उनसे प्रमाणित होता है कि यह स्थान लगभग दो हजार वर्ष पूर्व का है।
जनश्रुति है कि यहां पर एक बहुत पुराना मन्दिर था जो अब खण्डहर में बदल गया है। इस मन्दिर के नीचे एक सुरंग थी जिसके अवशेष बचे हुए हैं।
इस तीर्थ पर स्थापित किए गए डेरे का इतिहास लगभग 800 वर्ष पुराना है। यहां पहले जो आचार्य शम्बु देव ने इसकी स्थापना की थी। इस डेरे में आचार्य रामदास, रणछोर दास, हाथीदास, गणेशीदास, बृजदास थे। बृजदास की मृत्यु के बाद यहां का कार्यभार समिति द्वारा 1996 से चलाया जा रहा है। यह हिन्दुस्तान का सबसे बड़ा मुक्ति द्वार है।
यहां का जो तीर्थ है, उसकी खुदाई के समय पांडव के पांच कूरो तीर्थ के अन्दर है। यहां की सबसे बड़ी खूबी यह है कि तीर्थ के अन्दर यक्ष मंदिर की तरफ अपने आप पानी आता है और तालाब भरा रहता है। अब राज्यपाल द्वारा यहां पर यक्ष की स्थापना की गई है और इस तीर्थ की मुरम्मत की गई है। इसके साथ-साथ ज़मीन पर ट्ïयूबवैल तथा पार्क आदि बनवा दिए गए है। इसी तीर्थ पर खिलाडिय़ों के लिए अखाड़ा बनवाया गया है। सारी ज़मीन पर पापुलर लगवाए गए हैं तथा नया बाग भी लगवाया गया है। तालाब पर खुदाई तथा सफाई करवाई गई है। तीर्थ पर ज़नाना घाट बनवाया गया है। यहां पर वर्ष में दो बार फाल्गुन की एकादशी व जन्माष्टमी को मेला लगता है।

सिद्घ शिव शनिधाम पानीपत

पानीपत के मुख्य बाजार में स्थित सिद्घ शनिधाम श्रद्घालुओं को धाॢमक एकता से सरोकार कराता है। इस शनिधान में जहां एक ओर आर्तियां होती हैं वहीं दूसरी ओर मुस्लिम श्रद्घालु नमाज अदा कर रहे हैं। इस धाम में शिव पार्वती की प्राचीन प्रतिमा सहित कई देवी-देवाओं की प्रतिमाएं स्थापित की गयी हैं। यह ऐसा मन्दिर जहां पंचमुखी शिवलिंग और माता अंजनी की गोद में हनुमान की प्रतिमा एक साथ स्थापित है। आस-पास के क्षेत्रों में इस शनिधामों को दादा-पोता मंदिर के नाम से भी जाना जाता है।

मंदिर गुरूद्वारा, पानीपत

पानीपत के तहसील कैंप राम नगर में आमने-सामने स्थित श्री गुरूनानक द्वारा और सनातन आश्रम मंदिर की अपनी ही मान्यता है। यहां एक ओर श्रद्घालु सनातन आश्रम मंदिर में शीश झुकाते हैं, वहीं दूसरी ओर श्री गुरूनानक द्वारे में मात्था टेकने के लिए संगत की भीड़ लगी ही रहती है। ये दोनों धाॢमक स्थल भाई चारे की मिसाल हैं। आमने-सामने स्थित होने के कारण दोनों धाॢमक स्थल मंदिर गुरूद्वारा के नाम से प्रसिद्घ है। संत श्रवण स्वरूप महाराज ने ही वर्ष 1976 में श्री गुरू नानक द्वारे की स्थापना की थी। उसी समय गुरूद्वारे के सामने ही सनातन आश्रम मंदिर का निर्माण किया गया।

रामचन्द्र जी का मंदिर

रामचन्द्र जी का मंदिर मोहल्ला बड़ी पहाड़ में स्थित है। नगर के अन्दर मराठों द्वारा बनवाया गया यह अकेला मंदिर है। यह 1793 ईस्वी में तत्कालीन महाराजा सिंघिया द्वारा निॢमत है।

दिगम्बर जैन मन्दिर

यह मन्दिर पुराने पानीपत नगर के पश्चिम में जैन मोहल्ले में स्थित है। इस मन्दिर की वास्तुकला के अनुसार इसका निर्माण 17वीं शताब्दी के आरम्भिक काल में किया गया।
कबीर-उल-औलिया हजरतशेख जलालुद्ïदीन की दरगाह-
शेख जलालुद्ïदीन पानीपत के प्रमुख सुफी संत हुए हैं। ये बू-अली शाह कलंदर के समकालीन थे। शेख जलालुद्ïदीन की मृत्यु 1364 ई.वी. में हुई लेकिन मकबरे का निर्माण 13 मई 1499 ई.वी. को फिरोज मुहम्मद लतुफउल्लाह अफगान ने करवाया। यह मककबरा पुराने पानीपत के पूर्वी भाग में स्थित था। आज यह मकदूम साहब के नाम से प्रसिद्घ है।

सैयद रोशन अली शाह दरगाह

पानीपत के सामान्य अस्पताल परिसर में स्थित सैयद रोशन अली शाह साहेब की दरगाह भाई-चारे की मिशाल है। यहां हर धर्म के लोग भाई-चारे के लिए दुआ करने पहुंचते हैं। दुर्लभ पुस्तक बुजुर्गान-ए-पानीपत के पन्नों से इस बात का पता चलता है कि सैयद रोशन अली शाह साहेब 149 हिजरी मुताबिक 728 ईस्वी पूर्व अपने 129 साथियों के साथ भाई-चारे और शांति का संदेश देने के लिए मक्का-मदीना व हैरात (अफगानिस्तान) होते पानीपत पहुंचे और यहीं के होकर रह गए।

अल्ताफ हुसैन हाली की कब्र

मसुल-उलमा की उपाधि से विभूषित अल्ताफ हुसैन हाली उर्दू, फारसी, अरबी व अंग्रेजों के अच्छे ज्ञाता थे। इन्होंने शिक्षा के प्रसार के लिए कई हजार रूपये इक्ठ्ïठे करके एक पुस्तकालय बनवाया व बाद में एक छोटा सा स्कूल शुरू करने में जुड गए जो बाद में हाली हाई स्कूल के नाम से प्रसिद्घ हुआ। भारत विभाजन के समय जी.टी.रोड़ पर स्थित आर्य हाई स्कूल ही हाली हाई स्कूल की पुरानी ईमारत में स्थानांतरित हुआ था। इस महान साहित्यकार की मृत्यु 31 दिसम्बर 1914 को पानीपत में हुई। इनकी कब्र बु-अली-शाह कलंदर दरगाह के प्रांगण में स्थित है। इनके नाम से एक पुस्तकालय भी वहीं बनाया गया है। नगर के एक पार्क का नाम भी हाली के नाम पर रखा गया है।

जामा मस्जिद

नगर की मुख्य मस्जिद को जामा मस्जिद कहते हैं। आज यह खैल बाजार में स्थापित है। लेकिन पानीपत की प्रमुख मस्जिद रहने के बावजूद अब चालू हालात में नहीं है। ये नगर के मध्य में और नगर की सबसे बड़ी मस्जिद है। इसकी वस्तु कला को देखकर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि इस मस्जिद का निर्माण 17वीं शताब्दी में हुआ।

हजरत ख्वाजा शमशुद्दीन का मकबरा

यह पानीपत के प्रमुख संत हुए हैं जो बु-अली शाह कलंदर के सम कालीन थे और शेख अलाउद्दीन शाबरी के अनुयायी थे। अपने गुरू की सलाह पर ये पानीपत में रूके। इनका मकबरा पुराने पानीपत में दक्षिण के मुख्य द्वार पर स्थापित था। वहीं से ही नगर में प्रवेश होता था। अब यह स्थान सनौली रोड़ पर स्थित है।

मदरसा-ए-गुम्बदान

यह स्मारक दो गुम्बदों की अलग-अलग ईमारतें हैं। इनकी वास्तुकला के अनुसार यह मदरसा सलतनत काल का है। यह पत्थर के बड़े-बड़े टुकड़ों से निॢमत है। आज यह शेख जलालुद्दीन की दरगाह के निकट 11 वार्ड में स्थित है। इस मदरसे का पुन: संचालन जिला मुज्जफर नगर कांघला निवासी मौलाना इफ्ïतकरूल हसन के प्रयासों से हुआ।

सलार फखरूद्ïदीन व हाफिज जमाला का मकबरा

यह मकबरा बू-अली शाह कलंदर के माता-पिता का है। इनके पिता इराक से आए थे। उपलब्ध साक्ष्य यह बताते हैं कि यह मकबरा दिल्ली के सुल्तान अलाऊद्ïदीन मासूद शाह के समय 1246 ईस्वी में बनाया गया। लेकिन समय के साथ-साथ ईमारत में काफी परिवर्तन होते रहे हैं।

पानीपत का किला

यह किला कोई दुर्ग की शक्ल में नहीं दिखता। यह पानीपत नगर के उत्तर-पूर्वी भाग का ही हिस्सा लगता है व इसमें कुछ ईटों के अवशेष दिखाई पड़ते हैं। अकबर कालीन लेखक अबुल फजल पानीपत में ईंटों के किले का उल्लेख करता है। इस किले पर ब्रिटिश काल के कुछ भवन थे। जिसमें गांधी मैमोरियल लाईब्रेरी भी थी। 1996 ई.वी. में तत्कालीन हरियाणा सरकार के आदेशानुसार यह भवन गिरा कर एक पार्क का निर्माण कर दिया गया है। इसके अतिरिक्त यहां पर नगर निगम पुस्कालय भी स्थापित किया गया है।

श्री श्याम जी का मन्दिर गांव चुलकाना

जनश्रुति है कि बनवास के समय पाण्डव पुत्र भीम बली व हिडम्बा नाम राक्षसी का पुत्र घटोतकच था। घटोचकच का पुत्र बर्बरीक हुआ। जो श्री कृष्ण भगवान की प्रेरणानुसार शक्ति रूपा देवी की सेवा सुश्रा जुट गए और दिन रात उनकी पूजा करके देवियों को प्रसन्न किया जिसके फलस्वरूप देवियों ने उन्हें तीन बाण देकर आर्शीवाद दिया कि जाओं तुम इन बाणों से तीनों लोकों को विजय कर लोगे।
इसी दौरान कुरूक्षेत्र में महाभारत होने जा रहा था। दोनों सेनाएं आमने-सामने जुटी थी। उधर बर्बरीक ने अपनी मां से युद्घ देखने की और युद्घ में भाग लेने की अनुमति मांगी। मां ने इस शर्त पर बर्बरीक को युद्घ भूमि में जाने दिया कि सदैव हारे हुए का साथ देंगे। क्योंकि उसे भय था कि कहीं पाण्डव सेना छोटी होने के कारण महाभारत में न हार जाए। बर्बरीक ने अपनी माता को बचन दिया कि वह अवश्य ही हारे हुए का साथ देगा। यह कहकर बर्बरीक तीनों बाण लेकर युद्व भूमि की ओर कूच कर गया।
उधर अन्र्तयामी भगवान श्रीकृष्ण जानते थे कि हार तो अवश्य ही कौरवों की होनी है और यदि बर्बरीक हारे का साथ देगा तो कही यह महाभारत खत्म ही न हो। इसलिए श्रीकृष्ण भगवान ने ब्राहम्ण का वेश धारण कर रास्ते में उनको टोका है वीर तुम कहां जा रहे हो तो उतर मिला महाभारत देखने उन्होंने पूछा तुम वहां क्या करोगे। बर्बरीक ने बताया कि सर्वनाश तो उनसे पूछा गया कि तेरी सेना कहां है तो बर्बरीक बताया कि उसे सेना की जरूरत नहीं है। मेरे पास तीन बाण ही तीन लोकों के लिए पर्याप्त है। परीक्षा के उद्ïदेश्य से श्री कृष्ण ने एक बाण से पास खड़े पीपल के पेड़ के सभी पते बिन्धने के लिए कहा और जानबूझ कर एक पता तोडक़र अपने पैर के नीचे दबा लिया। बर्बरीक ने ध्यान लगाकर अपन बाण छोड़ा जो सभी पतों को छेदता हुआ श्रीकृष्ण की परिक्रमा करने लगा। कृष्ण ने पूछने पर बर्बरीक ने बताया कि कोई पता आपके पैर के नीचे दबा है। पैर उठाकर देखा तो वह भी छीदा हुआ पाया। आश्चर्य चकित कृष्ण ने बर्बरीक को युद्व से दूर रखने हेतु बर्बरीक से दान रूप में उसका शीष मांग लिया। जो बर्बरीक ने सहर्ष स्वीकार कर लिया। परन्तु प्रार्थना की कि भगवान मुझे पूरा महाभारत का युद्ध दिखाने की कृपा करें। श्री कृष्ण तथास्तू कहकर उसे आर्शीवाद दिया कि जाओं कलियुग में तुम मेरे नाम से (श्याम)पूजे जाओंगे और प्रत्येक श्रद्वालु की मनोकामना आपके द्वारा पूर्ण की जाएगी। तभी से श्याम बाबा के दो प्रसिद्घ धाम एक खाटू धाम राजस्थान में और दूसारा धाम चुलकाना गांव जोकि दिल्ली की उत्तर दिशा में लगभग 70 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यह ग्राम हरियाणा राज्य के अन्र्तगत पानीपत जनपद के औद्योगिक नगर समालखा के दक्षिण में लगभग 5 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। इन दोनों स्थानों पर फाल्गुल मास की शुल्क पक्ष की दवादशी को भारी मेला लगता है। जहां लाखों की तादाद में श्रद्वालु दूर-दूर से आकर मनोकानाएं बाबा के दरबार में आकर मांगते हैं। जहां विस्तृत प्रांगण में विश्व स्तर के श्याम कुण्ड का शीघ्र ही निर्माण होने जा रहा है। यहां पर मेले में दंगल का भी आयोजन किया जाता है। जहां भारत के कौने-कौने से ख्याति प्राप्त पहलवान भाग लेते हैं। यहां पर ठहरने हेतु धर्मशालाओं का भी निर्माण किया जा रहा है। यह कार्य श्री श्याम सेवा समिति चुलकाना द्वारा ग्रामवासियों के पारस्परिक सहयोग से करवाया जा रहा है। सावन व फाल्गुन माह में कांवड लाकर शिवलिंग का गंगा जल से अभिषेक करेगा उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होगी तभी से इस मंदिर में हजारों श्रद्वालु हरिद्वार से पैदल चलकर कांवड चढ़ाते हैं। इस मंदिर का नामकरण संत गणेशानंद गिरि ने प्रकटेश्वर महादेव धाम किया और मंदिर की देखरेख के लिए एक प्रबन्ध कमेटी रामेश्वर जैन की अध्यक्षता में गठित की थी। सन्ï 1991-1992 में अचानक स्वामी गणेशानंद गांव छोडक़र चले गए और उन्हें खोजने के काफी प्रयास गांव वासियों व मंदिर कमेटी ने किए। परन्तु सफलता नहीं मिली और आज तक स्वामी जी के विषय में कोई जानकारी नहीं है।
इसी तरह गांव चुलकाना में श्याम बाबा के प्राचीन भव्य मन्दिर के साथ-साथ त्रेतायुग कालीन महॢष चुनकट का मन्दिर है। इस गांव में महॢष चुनकट जिनका नाम बाबा लकीसर भी था वे यहां परम्परानुसार तप किया करते थे। बाबा लकीसर आश्रम के प्रधान श्री सत्यवीर गुप्ता बताते हैं कि आज का ग्राम मात्र माना जाने वाला यह चुलकाना कभी एक सम्पन्न एवं समृद्घशाली नगर हुआ करता था। देश के विभिन्न राज्यों से इसके व्यापारिक सम्बन्ध थे। कहते हैं कि त्रेता युग में इस ऐतिहासिक युग में इस ऐतिहासिक नगरी के अरण्यों में ही एक बहुत पहंचे हुए महॢष चुनकट अथवा लकीसर का आश्रम था। महर्षि लकीसर ने राजा चकवाबेन की सेना को पूरी तरह एक कुशा से भसम कर दिया था। इसके प्रमाण नजदीक के गांव बिलंदपुर खेडी में आज भी मिलते हैं। जहां पर आज भी गुफाएं और अवशेष मौजूद हैं। बाबा लकीसर का यह आश्रम भारत वर्ष की 84 सिद्घ पीठों में से एक है। हरिद्वार में जयराम आश्रम के संस्थापक बाबा जयराम ने भी महॢष चुनकट की प्रेरणा से यहीं इसी स्थान पर तपस्या कर अध्यात्मिक सिद्घ प्राप्त की थी। इन्हीं चुनकट महॢष के नाम पर इस गांव का नाम चुलकाना पड़ा।

प्रगटेश्वर महादेव धाम गांव भादड़

प्रगटेश्वर महादेव धाम शिव मंदिर गांव भादड़ का इतिहास काफी रोचक होने के साथ-साथ बहुत ही दिलचस्प भी है। प्रकटेश्वर महादेव धाम पर श्रावन मास के कावड चढ़ाने से सभी मनोकमानाएं पूर्ण होती है। वर्ष में दो बार लगने वाले मेले में दूर-दराज के क्षेत्र से शिवभक्त यहां आकर भंडारा लगाते हैं तथा मन्नते मांगते है।पानीपत से दक्षिण पश्चिम दिशा में 10 किलोमीटर दूर गांव भादड़ में स्थित प्रकटेश्वर महादेव धाम शिव मन्दिर सात एकड़ भूमि में फैला हुआ है। गांव के बुजुर्गों को भी नहीं पता कि यह मन्दिर कब बना। वे बस इतना जानते है कि इस मन्दिर का इतिहास बहुत पुराना व रोचक है। इस मन्दिर में लगे हुए वृक्ष भी सैकड़ों साल पुराने है जिससे अनुमान लगाया जाता है कि यह मन्दिर करीब पांच सौ साल से भी अधिक पुराना होगा। गांव के पूर्व सरपंच एवं अध्यापक पालेराम ने बताया कि सन 1761 में जब पानीपत की तीसरी लड़ाई लड़ी गई थी तो मराठा सेना के सरदार सदाशिव राव भाऊ की सेना ने इसी गांव में पडाव डाला था और भाऊ ने इस शिव मंदिर का जीर्णोंद्वार भी करवाया था।
उन्होंने बताया कि जब 1944 में यह गांव मुस्लिम बाहुल था तो एक बार मुस्लिमों ने मंदिर में कोई आपतिजनक चीज टांग दी, जिससे गांव मेें सांप्रदायिक दंगा भी हुआ और ब्रिटिश शासन ने 80 हिन्दुओं को लाहौर जेल में छह माह की सजा के लिए भेज दिया। उस समय चतर सिंह छोटेराम, नन्नूराम, मुंशी पुत्र झण्डू, संदल राम आदि भी दंगे में संलिप्त पाने पर लाहौर जेल भेजा गया था। विभाजन के बाद जींद रियासत के गांव हाडवा से रोढ़ जाति के लोग यहां बस गए।
पालेराम बताते हैं कि एक बार मंदिर में लगा हुआ विशाल घंटा चोरों ने उतार लिया तो चोर जैसे ही मन्दिर से बाहर निकले वे अंधे हो गए और वह घंटा पुन: मंदिर में लगाया गया। मन्दिर के प्रांगण में ही एक संत बाबा भवन गिरि ने जीवित समाधि ली थीं वह संत बड़े ही कडवे स्वभाव के थे। जब उन्होंने समाधि ली तो कहा कि मेरी समाधि पर मेरे ही समान कडवी चीज उत्पन्न होगी। कुछ समय पश्चात समाधि के ईर्द-गिर्द अपने आप ही नीम के पेड़ उग गए।
पूर्व प्रधान इन्द्र सिंह ने शिव मन्दिर के बारे में क्विदंती बातते हुए कहा कि बड़े बुजुर्ग कहते है कि जहां अब मन्दिर स्थित है, इसके पीछे कुम्हार बर्तन के लिए मिट्ïटी खोद रहे थे तथा कुम्हार की सुरपी किसी ठोस वस्तु से टकराई तो उस जगह से दूध की धरा फुट पड़ी।
तब कुम्हार ने इस दैवीय शक्ति मानते हुए प्रकट होने को कहा कि और तब यह शिवलिंग अपने आप ही ऊपर आ गया और उस कुम्हार ने शिवलिंग की अराधना करने के पश्चात विनति की हे भोले नाथ इस शिवलिंग को टीले के बाजय किसी दूसरी जगह पर प्रकट कर दो ताकि श्रद्वालु इसकी पूजा कर सकें क्योंकि यह रास्ता अति दुर्गम है। तब यह शिवलिंग अपने आप ही टीले से इस पार प्रकट हो गया और उस कुम्हार ने एक शिव मन्दिर भी बनवाया और उस मन्दिर का जीर्णोद्वार समय-समय पर होता रहा है।

गांव पाथरी में शीतला माता का मेला

यह मेला चेत्र व आसाढ़ मास के प्रत्येक बुधवार को लगता है। यहां पर श्रद्घालु दूर-दूर आकर मन्नतें मानते है। इस मेले की विशेषता यह भी है कि यहां पर नवदम्पति आकर अपने गठ्जोड़े जात देते हैं तथा कहा जाता है कि एक बाल्मीकि लडक़ी थी जिसको अपने वंश को बचाने के लिए कुंए में डाल दिया था। इस बच्ची को तपस्वी साधुओं ने निकाल लिया जिसे हवा का रूप बना दिया। साधू ने इस लडक़ी को एक बाल्मीकि लडक़े को दे दिया। इस लडक़ी ने लडक़े के सामने भेडिय़ा, मेढ़ा, भेंट चढ़ऋाने की मांग रखी फिर भी वह पूर्ण नहीं हो सकी। कालान्तर में गांव में जानमाल का काफी नुकशान हो गया। भविष्य में इस नुकसान से बचने के एिल गांव वालों ने इस का मन्दिर बनवा दिया और लडक़ी की मांग मान ली।

दरवाजा शमशुदीन का मकबरा तथा शाह विलायती का मजार

यह दरगाह सनौली रोड़ पर स्थित है। इसमें बू-अली शाह कलन्दर के मुख्य शिष्य ख्वाजा शमशुदीन की मजार बनी हुई है। जब बूअली शाह कलन्दर पूजा के लिए करनाल के समीप बुढ़ाखेड़ा गांव के साथ यमुना नदी में चले गए थे तो उस समय उनका सारा कार्य उनके शिष्य ख्वाजा शमशुदीन ने किया था। दूर-दूर से लोग अपनी मन्नते मानने के लिए यहां आते हैं और ताला लगाकर चले जाते है जब उनकी कामना पूर्ण होती है तो उन द्वारा लगाया गया ताला बिना चाबी के स्वयं खुल जाता है। इस माजर के साथ लगता गुरूद्वारा व मंदिर भी हैं। हिन्दू मंस्लिम, सीख एकता का यह वास्तविक दर्शन होता है।

प्रेम मंदिर

“प्रेम का मन्दिर है प्रेम का स्थान है. प्रेम से जो जीव आये उसका ही कल्याण है”

पानीपत के वार्ड 3 में श्री प्रेम मन्दिर स्थित है। यह प्रेम. सेवा एवं एकता का महान संगम है। इसकी स्थापना सर्वप्रथम शहर लैय्या जो कि अब पाकिस्तान में है. वहां पर पूज्य गुरूदेव श्री श्री 108 श्री शान्ति देवी जी महाराज सुपुत्री श्री घनश्याम दास जी चान्दना के द्वारा 1920 में की गई थी। देश विभाजन के पश्चात पानीपत में आकर उसी परम्परा को आगे बढ़ाते हुए कार्य प्रारम्भ किया। वर्ष 1957 में वर्तमान में अपने ही भवन में इस वटवृक्ष को आगे बढ़ाया। इस समय मुख्य भवन के अतिरिक्त पानीपत शहर में दो अन्य स्थानों पर श्री रघुनाथ प्रेम मन्दिर. इंसार बाजार तथा श्री शान्ति प्रेम मन्दिर. पटेल नगर में परमार्थ तथा असहायों की सहायता का कार्य चल रहा है। पानीपत के अतिरिक्त सोनीपत. बहादुरगढ़. झज्जर. दुजाना. गुडियानी. कैथल तथा कानपुर में भी श्री प्रेम मन्दिर की शाखायें कार्यरत हैं।
श्री प्रेम मन्दिर का मुख्य सिद्धान्त सेवा. सिमरन. सत्संग़ संयम एवं सादगी पर आधारित है तथा यह गद्दी स्त्रीशक्ति द्वारा ही संचालित रहेगी। इसमें दीन दुखियों की सहायता करते हुए. अपने जन्म को संवारने की शिक्षा पर. चलते रहने की प्रेरणा दी जाती है।
प््रोमावतार श्री श्री 108 श्री शान्ति देवी जी महाराज ह्यसंस्थापिका श्री प्रेम मन्दिरहृ के 1980 में ब्रम्हलीन होने पर त्याग एवं तपस्या की मूर्ति परमपूज्या श्री बसन्दीबाई जी महाराज ने कार्यभार संभाला तथा अप्रेल 1985 में गुरूदेव के चरणों में लीन हो गये। तदुपरान्त त्याग एवं संयम की मूर्ति बालब्रम्हचारी श्री वन्तीदेवी जी महाराज ने गद्दी पर बैठकर गुरू दरबार की सेवा की। वर्ष 2001 में अपनी जीवन लीला को समेट कर इस का भार भक्ति स्वरूपा बालब्रम्हचारी श्री प्रकाश देवी जी महाराज को सौंप दिया। अपने सम्पूर्ण जीवन को गुरूगद्दी की सेवा करते हुए जीवन को सफल कर 2014 में गुरू चरणों में लीन हो गये। वर्तमान में बालब्रम्हचारी श्री कान्तादेवी जी महाराज को श्री प्रेम मन्दिर की सेवा का उत्तरदायित्व सौंपा गया।
यहां पर प्रारम्भ से ही दोनों समय सत्संग की धारा बहती है एवं वर्ष भर धार्मिक अनुष्ठान.पूजा. पाठ होते रहते हैं तथा सनातन परम्परा को आगे बढा.ने को कार्य होता है।प्रत्येक वर्ष फरवरी माह में वार्षिक यज्ञ के रूप में “प्रेम सम्मेलन” का आयोजन किया जाता है जिसमें दूर्रदूर से श्रद्धालुजन आकर अपने गुरूदेव के दर्शन के सार्थसाथ बाहर से आये हुए सन्तों के प्रवचन का लाभ उठाते हैं

“प्रेम प्रेम सब कोई कहे कठिन प्रेम की रीत. आदि अन्त पूरी निभे तभी जानिये प्रीत”

बाबा जोध सचियार

पानीपत से दिल्ली की तरफ सिखों के गुरू बाबा जोध सचियार का गुरूद्वारा अपने में एक विशेष महत्ता रखता है। इसके अन्दर बाबा जोध सचियार का समाधि स्थल है। इस गुरूद्वारे की मुख्य विशेषता यह है कि इसके हाल में जहां पर गुरू ग्रंथ साहब रखे हुए है वहां उसके साथ-साथ हर मजबह के चित्र भी दीवारों पर लगाए हुए है। ये गुरूद्वारा साम्प्रदायिक एकता का प्रतीक है। इसमें 24 घंटे लंगर चलता रहता है। लोग दूर-दराज से यहा आकर मान्यता मानते है इसमें एक मुफ्त डिस्पेंसरी भी चलाई जा रही है। प्रति वर्ष यहां पर बहुत बड़ा समाग्रम मनाया जाता है। जिसमें दूर-दूर से श्रद्घालुगण आते है और अपनी माननतें मानते है।